Angika Kavita | अंगिका कविता
सावन | Savan
रामनंदन विकल | Ramnandan Vikal
नैना भेले रे रतनार
सावन घन घिरी ऐले बालम
चुनरी भींजलै सारी रात
घुमङि घन लरजै हो बालम ।
उमतैले पुरबा बयार
अंचरवा उङावै हो बालम
नीन गेलै रे परदेश
सावन घन घिरी ऐले बालम ।
विरहा जगावै कोईलिया
पपिहा पुकारै हो बालम
झकझोरै झिंगुरा के तान
सावन घन घिरी ऐले बालम ।
नैना भेले रे रतनार सावन घन घिरी ऐले बालम ।
18-7-20
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सावन | Savan
रामनंदन विकल | Ramnandan Vikal

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