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Friday, July 10, 2020

आबरी | Angika Kavita | अंगिका कविता | अरूण कुमार पासवान | Abri | Angika Poetry | Arun Kumar Paswan

 

आबरी | अंगिका कविता | अरूण कुमार पासवान
Abri | Angika Kavita | Arun Kumar Paswan



  आभरी कैन्हो बज्जड़ खसलै,

             सब तरफो सँ आदमी फँसलै।

             

  ऐथैं-ऐथैं है ठो 'लपका' साल,

             समूचे दुनिया रो बिगड़लै हाल,

  ऐन्हो रोग,कि इलैजे नै कोनो,

             रोग की?कहो हेकरा 'महाकाल';

  बड़का बिपतें घेरा डाललकै त'

             सब कोय कानलै,कोय नै हँसलै।

  आभरी कैन्हो बज्जड़ खसलै,

              सब तरफो सँ आदमी फँसलै।

              

  यही बीचो म' हौ समुद्री तूफान,

              उड़ीसा,बंगाल में कत्ते नुकसान,

  एक ते आगिन,तेकरा प' ऊ घी,

               पैल्हें सँ अधमरुवो छेलै इंसान;

  फेरू आसाम आरो कै जगह बाढ़,

               कतना जान-माल डुबलै-भंसलै।

   आभरी कैन्हो बज्जड़ खसलै,

                चारो तरफो सँ आदमी फँसलै।

                

  आरो आबे बिहारो रो 'बजरपात'

               कत्ते लोगो के' यें करलकै घात!

  परकिरती जब' बिनाश पर ऐलै,

               आदमी रो तब' की छै औकात?

  बहुत घमण्ड त' छेलै आदमी क'

               उड़ी रैल्हो छेलै,पतालो म' धँसलै।

  आभरी कैन्हो बज्जड़ खसलै,

                 चारो तरफो सँ आदमी फँसलै।

                             अरुण कुमार पासवान

                                 07 जुलाई,2020

आबरी | अंगिका कविता | अरूण कुमार पासवान
Abri | Angika Poetry | Arun Kumar Paswan

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