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Thursday, October 12, 2017

रात बितलऽ छै होलै बिहान | अंगिका कविता | कैलाश झा 'किंकर'

रात बितलऽ छै होलै बिहान
अंगिका गीत | कैलाश झा 'किंकर'

रात बितलऽ छै होलै बिहान
लाल भेलै सगर आसमान ।


जागि गेलै चिड़ैया तमाम
खेत चललऽ छै अपनऽ किसान ।


सौऽन-भादऽ के भरलऽ तड़ाग
भोर होतं॑ शुरू छै स्नान ।


नोन-रोटी के चिन्ता सताय
काम ढूँढै ल॑ चललै जवान ।


अंग देशऽ के उमगित बयार
अंगिका के बढ़ाबै गुमान ।


फेनू बर्षा के ऐलै फुहार
जाड़ आबै के आहट सुजान ।

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