अंशऽ बरै छै
— कुंदन अमिताभ —
हल्ला – गुल्ला नै करऽ हो अंशऽ बरै छै
भोकार-ढकार नै पारऽ हो अंशऽ बरै छै ।
जमीनऽ पर नै, रह॑ द॑ तनी देर सपना मं॑
भरम मौसतऽ के देखी तोरऽ अंशऽ बरै छै ।
झरखलऽ जाय छै पर बतलाबै छो चरफरऽ
जंगल मं॑ बस्ती के रफ्तार देखी अंशऽ बरै छै ।
हर बाथै मं॑ पड़ोसी क॑ दोष दै केरऽ खिस्सा
हय रकम सहजैलऽ धात देखी अंशऽ बरै छै ।
इनारा सुखलै ! पीयऽ बस बोतल बंद पानी
देखौसी मं॑ घऽर बिकतें देखी अंशऽ बरै छै ।
मानवता केरऽ सबसं॑ बड़ऽ दुश्मन मानव
टेंगारी आपने गोरऽ प॑ देखी अंशऽ बरै छै ।
Angika Poetry : Ansho Barai Chhai
Poetry from Angika Poetry Book : Dhamas (धमस)
Poet : Kundan Amitabh

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