जत्त॑ हटकै
— मथुरानाथ सिंह ‘रानीपुरी’ —
कौआ काँव-काँव कुत्ता भूकै
दिन अन्हरिया रात नै सूझै
हड़हड़ – गड़ग़ड देहे झूलै
काँटऽ कूशऽ सगठें फूलै ।
सनफन पिल्लू पेट्हें कोंचै
जीत्ते मुर्दा गीधें नोचै
माटी टूटलै धूरा फटकै
बाहरें खनखन भीतरें चटकै ।
चिड़िया गुमसुम बाझहें गटकै
इ बलजोरी अपन्हैं ढचकै
य़हो डकार ‘रानीपुरी ‘अपनऽ
गाड़ी के पहिया जत्त॑ हटकै ।
Angika Poetry :Jattai Hatkai
Poet : Mathuranath Singh ‘Ranipuri’

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