फसल गीत
– रामधारी सिंह ‘काव्यतीर्थ ‘ –
धानॊ के कियारी आरी घूमै छै किसनमां
से झूमी-झूमी ना, हो झूमी-झूमी ना ।
धान काटै छै कटनियाँ
से घूमी-घूमी ना, हो घूमी-घूमी ना ।
धनमा कॆ देखी हिया हरसै किसनमा
के रसी-रसी ना, हो रसी-रसी ना ।
बायरॊ के साथॆं-साथॆं राखै धान कटनियाँ
सॆ मुट्ठी-मुट्टी ना, हो मुट्ठी-मुट्टी ना ।
देखी-देखी कॆ किसनमा के फाटै छतिया
से रही-रही ना, हो रही-रही ना ।
कहै छै किसनमां तॆ बोलै छै कटनियाँ
से रूठी-रूठी ना, हो रूठी-रूठी ना ।
हम्मॆं कल सॆं काटवौं नैं धनमा
से रिझी-रिझी ना, हो रिझी-रिझी ना ।
होय कॆ लाचार बोलै रे किसनमा
से लीहॊ – लीहॊ ना, हो लीहॊ – लीहॊ ना ।
Angika Poetry : फसल गीत
Poetry from Angika Poetry Book : गगन घटा घहराबै
Poet : Ramdhari Singh Kavyatirth

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