मातृ-वन्दना
— अनिल शंकर झा —
रूक रे बटोही तनि भूमि केॅ नमन कर,
यही दानवीर कर्ण गोदी में खेललकै ।
एकरोॅ दुआरी पर देवराज इन्द्र नें भी,
झुकी केॅ याचक बनी दान-मान पैलकै ।
एकरोॅ गोदी में बैठी योगी बली जाह्नवी,
सुरसरी के अहम् क्षण में मिटैलकै ।
सागर मंथन करी, चौदहो रतन गही,
देव आ असुर क यें दान करी देलकै ।।
यहीं बाबा भोलेनाथ रावणेश महादेव,
कामना पूरन लेली नर-नारी आबै रे ।
यहीं माता सुरसरि, बिहुला के पुण्य-कथा,
पतित-पावनी तीनों ताप बिलगावै रे ।
यही अंगभूमि जहा° सरःपाद आदि कवि,
भवप्रीतानंद, दिनकर, रेणु भावै रे ।
विÿमशिला के ज्ञान दूर-दूर दुनिया में,
चीन जावा थाइलेंडें घरे-घर गाबै रे ।।
यहीं चम्पा-नगरी सें चम्पा के सुगंध बहै,
चारो ओर मंद-मंद यशोगान गाबै रे ।
यही बंदरगाहों ॅ सें चलै जे जलयान दूर,
दूर देशें एकरा सें सब कुछ पावै रे ।
रेशमो ॅ के धरती में सोना रंग ओन उगै,
धरती जे नेहोॅ सें सभै केॅ दुलराबै रे ।
रूक रे बटोही यहा°, शीतल बयार यहा°,
अतिथि लेॅ प्यार यहा° मोॅन हरसाबै रे ।।
Angika Poetry : Matri Vandana / मातृ-वन्दना
Poet : Anil Shankar Jha / अनिल शंकर झा

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