Angika Kavita | अंगिका कविता
वही दिलऽ प॑ जग क॑ नाज छै | Vahi Dilow Pa Jag ka Naaj Chhai
विद्याभूषण सिंह ‘वेणु’ | VidyaBhushan Singh 'Venu'
यहाँ, जै दिलें अनुराग छै,
वही दिलऽ प॑ जग क॑ नाज छै ।
जै दिलें दीय॑ खुशी, कि कोय नञ रह॑ दुखी,
नमन हजार बार वै दिलऽ क॑ भी झुकी – झुकी,
वही दिलऽ के कारणें
इ दुनिया में कायम हास छै ।
वही दिलऽ प॑ जग क॑ नाज छै ।
छै दिल व॑ह॑ महान भी, कि जें कर॑ कुछ दान भी,
कि जै दिलें उमंग छै वही दिलऽ के शान भी,
वही दिलऽ के विश्व भी
सदियों सें बनलऽ इ दास छै ।
वही दिलऽ प॑ जग क॑ नाज छै ।
दीय॑ वही दिलं॑ सुवास, दिल यहाँ जे छै बेदाग,
वही दिलं॑ कर॑ सक॑,यहाँ हर दिलऽ प॑ राज,
वही दिलें निराश के
बुझाबै सदा भी प्यास छै ।
वही दिलऽ प॑ जग क॑ नाज छै ।
कि दिल व॑ह॑ अधम यहाँ, जे नञ नम, नरम यहाँ,
उ दिल की दिल,नयन में, जेकरा भी नञ शरम यहाँ,
बस चाहियऽ त॑ दिल व॑ह॑
मानवता के जै में वास छै ।
वही दिलऽ प॑ जग क॑ नाज छै ।
Angika Poetry : Vohi Dilow Pa Jag ka Naj Chhai
Poet : VidyaBhushan Singh ‘Venu’
Poetry from Angika Poetry Book : Mahmah Phool
Angika Kavita | अंगिका कविता
वही दिलऽ प॑ जग क॑ नाज छै | Vahi Dilow Pa Jag ka Naaj Chhai
विद्याभूषण सिंह ‘वेणु’ | VidyaBhushan Singh 'Venu'

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