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Wednesday, July 29, 2015

गरमैलऽ छै कलम | Angika Kavita | Garmailow Chhai Kalam | अंगिका कविता | विद्याभूषण सिंह ‘वेणु’ | VidyaBhushan Singh 'Venu'

Angika Kavita | अंगिका कविता
गरमैलऽ छै कलम | Garmailow Chhai Kalam
विद्याभूषण सिंह ‘वेणु’ | VidyaBhushan Singh 'Venu'


के कहै छै कि इ नरमैलऽ छै कलम ।
सावधान रे कि इ गरमैलऽ छै कलम ।


धरती क॑ नञ देख॑ बुरा नजरऽ सें आकाशें,
कि जुल्मी क॑ मिटाय ल॑ इ उमतैलऽ छै कलम ।


मालूम जोंकऽ क॑ कि खून आरो भी छै पीयै वाला,
कि रोशनाय सें जादे इ खून पिलैलऽ छै कलम ।


जुल्म करै वाला कोय भी मगर वें जानी लिय॑,
कि जुल्मऽ के विरोध करै ल॑ इ जिदियैलऽ छै कलम ।


नेता रह॑ या अभिनेता, मंतरी-संतरी या कोय भी,
नञ केखरौ आगू भी इ रिरियैलऽ छै कलम ।


जब॑ भी जहाँ उठलऽ छै आवाज, बुराई के विरोधें
वहाँ-वहाँ उगलै ल॑ आगिन इ अगुऐलऽ छै कलम ।


“वेणु” केकरहौ छै जलन आय केकरो उत्थानऽ प॑,
लेकिन दोसरा के विकास पर इ हरषैलऽ छै कलम ।


Angika Poetry :Garmailow Chhai Kalam
Poet : VidyaBhushan Singh ‘Venu’
Poetry from Angika Poetry Book : Mahmah Phool


गरमैलऽ छै कलम | Angika Kavita |  Garmailow Chhai Kalam | अंगिका कविता | विद्याभूषण सिंह ‘वेणु’ | VidyaBhushan Singh 'Venu'


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