Angika Kavita | अंगिका कविता
गरमैलऽ छै कलम | Garmailow Chhai Kalam
विद्याभूषण सिंह ‘वेणु’ | VidyaBhushan Singh 'Venu'
के कहै छै कि इ नरमैलऽ छै कलम ।
सावधान रे कि इ गरमैलऽ छै कलम ।
धरती क॑ नञ देख॑ बुरा नजरऽ सें आकाशें,
कि जुल्मी क॑ मिटाय ल॑ इ उमतैलऽ छै कलम ।
मालूम जोंकऽ क॑ कि खून आरो भी छै पीयै वाला,
कि रोशनाय सें जादे इ खून पिलैलऽ छै कलम ।
जुल्म करै वाला कोय भी मगर वें जानी लिय॑,
कि जुल्मऽ के विरोध करै ल॑ इ जिदियैलऽ छै कलम ।
नेता रह॑ या अभिनेता, मंतरी-संतरी या कोय भी,
नञ केखरौ आगू भी इ रिरियैलऽ छै कलम ।
जब॑ भी जहाँ उठलऽ छै आवाज, बुराई के विरोधें
वहाँ-वहाँ उगलै ल॑ आगिन इ अगुऐलऽ छै कलम ।
“वेणु” केकरहौ छै जलन आय केकरो उत्थानऽ प॑,
लेकिन दोसरा के विकास पर इ हरषैलऽ छै कलम ।
Angika Poetry :Garmailow Chhai Kalam
Poet : VidyaBhushan Singh ‘Venu’
Poetry from Angika Poetry Book : Mahmah Phool

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