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Tuesday, June 23, 2015

तरसोइयाँ | अंगिका कविता | रमेश मोहन शर्मा ‘आत्मविश्वास’

तरसोइयाँ


— रमेश मोहन शर्मा ‘आत्मविश्वास’ —


भरी गेलै कुइयाँ
जुमी गेलै दोल
कत्तॆ पानी पीबॆ मोसाफिर
बोली दॆ तोंय बोल.


गांग भेलै गन्दा
कोसी भेलै लाल
पानी तॆ तरसोइयाँ मारै
उपटी गेलै कोल.


फल सूखलै केला सूखलै
आरू सुखलै चोइयाँ
बाग-बगीचा सल-सल करय
डूबॆ रे लागलै टोल.


माल-मवेशी काँहाँ रहतै
केनाँ खैइतै पोहिया
कत्तॆ तोंय बरसभॊ आबॆ
छोड़ी दॆ पनसइयाँ.


उपर तोंय तरॆ तरसोइयाँ
सुनॊ आबॆ सुनॊ हमरॊ गोइयाँ
केना कॆ जान बचतै
सुनाबॊ आपनॊ बोल.


आमीं गाछी बैठी कोइलिया
करॊ नै तोंय शोर
रिमझिम – रिमझिम बूँदा बरसै
छोड़ी रे देबॊ चोल


Angika Poetry : तरसोइयाँ
Poetry from Angika Poetry Book : अंग – संग
Poet : रमेश मोहन शर्मा ‘आत्मविश्वास’

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