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Sunday, June 21, 2015

योग योग छेकै | अंगिका कविता | कुंदन अमिताभ

योग योग छेकै


— कुंदन अमिताभ —


योग योग छेकै आत्मा के परमात्मा सॆं


योग छेकै बैहार बीच
बनलॊ रस्ता, पगडंडी
जेकरा पर डेगे डेग बढ़ला पर
व्यक्तिगत चेतना के मिलन होय छै
सार्वभौमिक चेतना सॆं
योग योग छेकै आत्मा के परमात्मा सॆं


योग छेकै बैहार बीच
बनलॊ आर, अड्डा
जेकरा पर कलॆ कलॆ बढ़ला पर
व्यक्तिगत रूह के मिलन होय छै
सार्वभौमिक रूह सॆं
योग योग छेकै आत्मा के परमात्मा सॆं


योग छेकै बैहार बीच
बनलॊ नहर, नद्दी
जेकरा मॆं कलॆ – कलॆ हेली कॆ
व्यक्तिगत प्राणशक्ति के मिलन होय छै
सार्वभौमिक प्राणशक्ति सॆं
योग योग छेकै आत्मा के परमात्मा सॆं


योग छेकै बैहार बीच
बनलॊ  बड़का चौर
जेकरा कलॆ – कलॆ पार करी कॆ
व्यक्तिगत प्रज्ञा के मिलन होय छै
सार्वभौमिक प्रज्ञा सॆं
योग योग छेकै आत्मा के परमात्मा सॆं


योग छेकै बैहार बीच
बनलॊ छोटॊ – छोटॊ डाँर
जेकरा टप्पी करी कॆ
व्यक्तिगत आत्मा के मिलन होय छै
सार्वभौमिक आत्मा सॆं
योग योग छेकै आत्मा के परमात्मा सॆं


योग खाली शरीर आरू मन
मन आरू आत्मा के योग नै छेकै
योग छेकै एगॊ महासंयोग
जेकरा पर कलॆ-कलॆ बढ़ला पर
ठीक होय छै तन, मन, आत्मा
योग योग छेकै आत्मा के परमात्मा सॆं


Angika Poetry : Yog Yog Chhekai
Poetry from Angika Poetry Book : Sarang
Poet : Kundan Amitabh

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