Angika Kavita | अंगिका कविता
बगरो | Bagro
by कुंदन अमिताभ | Kundan Amitabh
बिना हाथ के चोंचॊ सॆ ही
तिनका-तिनका चूनै छी
चीं-चीं चीं-चीं करी करी कॆ
आपनॊ घर कॆ बूनै छी
हमरॊ शरीर बड्डी छोटॊ
पैखना पर भी ओछॊ छींटॊ
गोर करै छै डगमग डगमग
गरदा सॆं दाना चूनै छी
चीं-चीं चीं-चीं करी करी कॆ
आपनॊ घर कॆ बूनै छी
नै हमरा खेत खलिहान
नै कोनॊ कोठी - गोदाम
रोजाना ही घुमी घुमी कॆ
पेटॊ मॆं दाना सैतै छी
चीं-चीं चीं-चीं करी करी कॆ
आपनॊ घर कॆ बूनै छी
साथी पंछी उड़ी उड़ी कॆ
परदेशॊ मॆं घूमै छै
हम्में बगरॊ रही सही कॆं
गामॊ के ढग्घर ही घूमै छी
चीं-चीं चीं-चीं करी करी कॆ
आपनॊ घर कॆ बूनै छी
चहकतॆं रहना हौला लगै छै
बंद कोठरी कॆ छोड़ी करी कॆ
आजादी कॆ ही चुनै छी
चीं-चीं चीं-चीं करी करी कॆ
आपनॊ घर कॆ बूनै छी
Angika Kavita | अंगिका कविता
बगरो | Bagro
by कुंदन अमिताभ | Kundan Amitabh
Angika Poetry : Bagro
Poetry from Angika Poetry Book : Sarang
Poet : Kundan Amitabh
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