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Wednesday, June 1, 2005

कश्मीर केरऽ लोर | Angika Kavita | Kashmir Kerow Lore | अंगिका कविता | by कुंदन अमिताभ | Kundan Amitabh

 

Angika Kavita | अंगिका कविता
कश्मीर केरऽ लोर | Kashmir Kerow Lore
by कुंदन अमिताभ  | Kundan Amitabh


नद्दी उफनी-उफनी क शहरौ मँ बहै छै
लहू अबै नसौ मँ नै सड़कौ पर बहै छै ।
डार सुखलौ प्यार के पत्ता झरी गेलै
बीयाबानौ मँ बस जालिम हवा बहै छै ।
धूरा-बवंडर मँ लेबझलौ शहरौ के पोर
धोधैलौ रेत सगर बेसुमार बहै छै ।
कन-कन ठार जिगर धुंध व कोहासौ सगर
जिहादी धार मँ स्वर्ग व आजादी बहै छै ।
छिरियलै आतँकी आगिन झरखलै सँसार
लोर कश्मीर के सँघरलै त जग दहै छै ।

Angika Kavita | अंगिका कविता
कश्मीर केरऽ लोर | Kashmir Kerow Lore
by कुंदन अमिताभ  | Kundan Amitabh

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